द्युतिं धत्ते यस्य त्रिवलिलतिकासङ्कटतरं
सखे दामश्रेणीक्षपणरचनाभिज्ञमुदरम् ।
यशोदा यस्यान्तः सुरनरभुजङ्गैः परिवृतं
मुखद्वारा वारद्वयमवलुलोके त्रिभुवनम् ॥
द्युतिं धत्ते यस्य त्रिवलिलतिकासङ्कटतरं
सखे दामश्रेणीक्षपणरचनाभिज्ञमुदरम् ।
यशोदा यस्यान्तः सुरनरभुजङ्गैः परिवृतं
मुखद्वारा वारद्वयमवलुलोके त्रिभुवनम् ॥
सखे दामश्रेणीक्षपणरचनाभिज्ञमुदरम् ।
यशोदा यस्यान्तः सुरनरभुजङ्गैः परिवृतं
मुखद्वारा वारद्वयमवलुलोके त्रिभुवनम् ॥
अन्वयः
AI
सखे! यस्य उदरम् त्रि-वलि-लतिका-सङ्कट-तरम् दाम-श्रेणी-क्षपण-रचना-अभिज्ञम् द्युतिम् धत्ते, यशोदा यस्य अन्तः सुर-नर-भुजङ्गैः परिवृतम् त्रिभुवनम् मुख-द्वारा वार-द्वयम् अवलुलोके।
Summary
AI
O friend! His abdomen, marked by three beautiful creases and showing signs of once being bound by ropes, possesses great luster. Within it, *Yaśodā* twice beheld the entire universe, including gods, men, and serpents, through the gateway of his mouth.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्यु | तिं | ध | त्ते | य | स्य | त्रि | व | लि | ल | ति | का | स | ङ्क | ट | त | रं |
| स | खे | दा | म | श्रे | णी | क्ष | प | ण | र | च | ना | भि | ज्ञ | मु | द | रम् |
| य | शो | दा | य | स्या | न्तः | सु | र | न | र | भु | ज | ङ्गैः | प | रि | वृ | तं |
| मु | ख | द्वा | रा | वा | र | द्व | य | म | व | लु | लो | के | त्रि | भु | व | नम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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