उरौ यस्य स्फारं स्फुरति वनमालावलयितं
वितन्वानं तन्वीजनमनसि सद्यो मनसिजम् ।
मरीचीभिर्यस्मिन् रविनिवहतुल्योऽपि वहते
सदा खद्योताभां भुवनमधुरः कौस्तुभमणिः ॥
उरौ यस्य स्फारं स्फुरति वनमालावलयितं
वितन्वानं तन्वीजनमनसि सद्यो मनसिजम् ।
मरीचीभिर्यस्मिन् रविनिवहतुल्योऽपि वहते
सदा खद्योताभां भुवनमधुरः कौस्तुभमणिः ॥
वितन्वानं तन्वीजनमनसि सद्यो मनसिजम् ।
मरीचीभिर्यस्मिन् रविनिवहतुल्योऽपि वहते
सदा खद्योताभां भुवनमधुरः कौस्तुभमणिः ॥
अन्वयः
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यस्य उरौ वन-माला-वलयितम् स्फारम् स्फुरति, तन्वी-जन-मनसि सद्यः मनसिजम् वितन्वानम्, यस्मिन् मरीचीभिः रवि-निवह-तुल्यः अपि भुवन-मधुरः कौस्तुभ-मणिः सदा खद्योत-आभाम् वहते।
Summary
AI
Upon his broad chest shines the forest garland, instantly awakening desire in the hearts of slender maidens. On that chest, the world-enchanting *Kaustubha* gem, though equal to a multitude of suns in its rays, appears only as bright as a firefly.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | रौ | य | स्य | स्फा | रं | स्फु | र | ति | व | न | मा | ला | व | ल | यि | तं |
| वि | त | न्वा | नं | त | न्वी | ज | न | म | न | सि | स | द्यो | म | न | सि | जम् |
| म | री | ची | भि | र्य | स्मि | न्र | वि | नि | व | ह | तु | ल्यो | ऽपि | व | ह | ते |
| स | दा | ख | द्यो | ता | भां | भु | व | न | म | धु | रः | कौ | स्तु | भ | म | णिः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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