सखे यस्याभीरीनयनसफरीजीवनविधौ
निदानं गाम्भीर्यप्रसरकलिता नाभिसरसी ।
यतः कल्पस्यादौ सजलजनकोत्पत्तिवडभी-
गभीरान्तः कक्षाधृतभुवनमम्भोरुहमभूत् ॥
सखे यस्याभीरीनयनसफरीजीवनविधौ
निदानं गाम्भीर्यप्रसरकलिता नाभिसरसी ।
यतः कल्पस्यादौ सजलजनकोत्पत्तिवडभी-
गभीरान्तः कक्षाधृतभुवनमम्भोरुहमभूत् ॥
निदानं गाम्भीर्यप्रसरकलिता नाभिसरसी ।
यतः कल्पस्यादौ सजलजनकोत्पत्तिवडभी-
गभीरान्तः कक्षाधृतभुवनमम्भोरुहमभूत् ॥
अन्वयः
AI
सखे! यस्य गाम्भीर्य-प्रसर-कलिता नाभि-सरसी आभीरी-नयन-सफरी-जीवन-विधौ निदानम्, यतः कल्पस्य आदौ सजल-जनक-उत्पत्ति-वडभी-गभीर-अन्तः कक्षा-धृत-भुवनम् अम्भोरुहम् अभूत्।
Summary
AI
O friend! His deep navel-lake is the primary source for the life of the *Gopīs*’ eyes, which are like *Saphari* fish. From this navel, at the start of the *Kalpa*, arose the lotus that held the entire universe within its deep interior, serving as the birth-chamber for *Brahmā*.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | खे | य | स्या | भी | री | न | य | न | स | फ | री | जी | व | न | वि | धौ |
| नि | दा | नं | गा | म्भी | र्य | प्र | स | र | क | लि | ता | ना | भि | स | र | सी |
| य | तः | क | ल्प | स्या | दौ | स | ज | ल | ज | न | को | त्प | त्ति | व | ड | भी |
| ग | भी | रा | न्तः | क | क्षा | धृ | त | भु | व | न | म | म्भो | रु | ह | म | भूत् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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