सरोजानां व्यूहः श्रियमभिलषन् यस्य पदयो-
र्ययौ रागाढ्यानां विधुरमुदवासव्रतविधिम् ।
हिमं वन्दे नीचैरनुचितविधानव्यसनिनां
यदेषां प्राणान्तं दमनमनुवर्षं प्रणयति ॥
सरोजानां व्यूहः श्रियमभिलषन् यस्य पदयो-
र्ययौ रागाढ्यानां विधुरमुदवासव्रतविधिम् ।
हिमं वन्दे नीचैरनुचितविधानव्यसनिनां
यदेषां प्राणान्तं दमनमनुवर्षं प्रणयति ॥
र्ययौ रागाढ्यानां विधुरमुदवासव्रतविधिम् ।
हिमं वन्दे नीचैरनुचितविधानव्यसनिनां
यदेषां प्राणान्तं दमनमनुवर्षं प्रणयति ॥
अन्वयः
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यस्य पदयोः श्रियम् अभिलषन् रागाढ्यानाम् सरोजानाम् व्यूहः विधुरम् उदवास-व्रत-विधिम् ययौ, नीचैः अनुचित-विधान-व्यसनिनाम् हिमम् वन्दे, यत् एषाम् प्रति-वर्षम् प्राण-अन्तम् दमनम् प्रणयति।
Summary
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Seeking the beauty of his feet, the multitude of red lotuses undertook a difficult vow of living in water. I bow to the frost, which, though prone to improper acts, annually brings a life-ending subdual to these lotuses for their audacity in competing with his feet.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | रो | जा | नां | व्यू | हः | श्रि | य | म | भि | ल | ष | न्य | स्य | प | द | यो |
| र्य | यौ | रा | गा | ढ्या | नां | वि | धु | र | मु | द | वा | स | व्र | त | वि | धिम् |
| हि | मं | व | न्दे | नी | चै | र | नु | चि | त | वि | धा | न | व्य | स | नि | नां |
| य | दे | षां | प्रा | णा | न्तं | द | म | न | म | नु | व | र्षं | प्र | ण | य | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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