विराजन्ते यस्यव्रजशिशुकुलस्तेयविकल-
स्वयम्भूचूडाग्रैर्लुलितशिखराः पादनखराः ।
क्षणं यान् आलोक्य प्रकटपरमानन्दविवशः
स देवर्षिर्मुक्तान् अपि तनुभृतः शोचति भृशम् ॥
विराजन्ते यस्यव्रजशिशुकुलस्तेयविकल-
स्वयम्भूचूडाग्रैर्लुलितशिखराः पादनखराः ।
क्षणं यान् आलोक्य प्रकटपरमानन्दविवशः
स देवर्षिर्मुक्तान् अपि तनुभृतः शोचति भृशम् ॥
स्वयम्भूचूडाग्रैर्लुलितशिखराः पादनखराः ।
क्षणं यान् आलोक्य प्रकटपरमानन्दविवशः
स देवर्षिर्मुक्तान् अपि तनुभृतः शोचति भृशम् ॥
अन्वयः
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यस्य पाद-नखराः व्रज-शिशु-कुल-स्तेय-विकल-स्वयम्भू-चूडा-अग्रैः लुलित-शिखराः विराजन्ते, यान् क्षणम् आलोक्य प्रकट-परमानन्द-विवशः सः देव-ऋषिः मुक्तान् अपि तनु-भृतः भृशम् शोचति।
Summary
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His toenails shine, their tips touched by the crest of *Brahmā*’s crown when he was humbled after stealing the cowherd boys. Beholding them for a moment, the divine sage *Nārada*, overwhelmed by manifest supreme bliss, deeply pities even those liberated souls who still possess bodies.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | रा | ज | न्ते | य | स्य | व्र | ज | शि | शु | कु | ल | स्ते | य | वि | क | ल |
| स्व | य | म्भू | चू | डा | ग्रै | र्लु | लि | त | शि | ख | राः | पा | द | न | ख | राः |
| क्ष | णं | या | ना | लो | क्य | प्र | क | ट | प | र | मा | न | न्द | वि | व | शः |
| स | दे | व | र्षि | र्मु | क्ता | न | पि | त | नु | भृ | तः | शो | च | ति | भृ | शम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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