न निर्वक्तुं दामोदरपदकनिष्ठाङ्गुलिनख-
द्युतीनां लावण्यं भवति चतुरास्योऽपि चतुरः ।
तथापि स्त्रीप्रज्ञासुलभतरलत्वादहमसौ
प्रवृत्ता तन्मूर्तिस्तवरतिमहासाहसवशे ॥
न निर्वक्तुं दामोदरपदकनिष्ठाङ्गुलिनख-
द्युतीनां लावण्यं भवति चतुरास्योऽपि चतुरः ।
तथापि स्त्रीप्रज्ञासुलभतरलत्वादहमसौ
प्रवृत्ता तन्मूर्तिस्तवरतिमहासाहसवशे ॥
द्युतीनां लावण्यं भवति चतुरास्योऽपि चतुरः ।
तथापि स्त्रीप्रज्ञासुलभतरलत्वादहमसौ
प्रवृत्ता तन्मूर्तिस्तवरतिमहासाहसवशे ॥
अन्वयः
AI
दामोदर-पद-कनिष्ठा-अङ्गुलि-नख-द्युतीनाम् लावण्यम् निर्वक्तुम् चतुरास्यः अपि चतुरः न भवति, तथापि स्त्री-प्रज्ञा-सुलभ-तरलत्वात् अहम् असौ तन्-मूर्ति-स्तव-रति-महा-साहस-वशे प्रवृत्ता।
Summary
AI
Even the four-faced *Brahmā* is not clever enough to describe the beauty of the radiance of the nail on the little toe of *Dāmodara*’s foot. Nevertheless, due to the natural restlessness of a woman's intellect, I have ventured into this great audacity of praising his divine form out of love.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | नि | र्व | क्तुं | दा | मो | द | र | प | द | क | नि | ष्ठा | ङ्गु | लि | न | ख |
| द्यु | ती | नां | ला | व | ण्यं | भ | व | ति | च | तु | रा | स्यो | ऽपि | च | तु | रः |
| त | था | पि | स्त्री | प्र | ज्ञा | सु | ल | भ | त | र | ल | त्वा | द | ह | म | सौ |
| प्र | वृ | त्ता | त | न्मू | र्ति | स्त | व | र | ति | म | हा | सा | ह | स | व | शे |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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