विहङ्गेन्द्रो युग्मीकृतकरसरोजो भुवि पुरः
कृतासङ्गो भावी प्रजविनि निर्देशेऽर्पितमनाः ।
छदद्वन्द्वे यस्य ध्वनति मथुरावासिबटवो
व्यदस्यन्ते सामस्वरजनितमन्योन्यकलहम् ॥
विहङ्गेन्द्रो युग्मीकृतकरसरोजो भुवि पुरः
कृतासङ्गो भावी प्रजविनि निर्देशेऽर्पितमनाः ।
छदद्वन्द्वे यस्य ध्वनति मथुरावासिबटवो
व्यदस्यन्ते सामस्वरजनितमन्योन्यकलहम् ॥
कृतासङ्गो भावी प्रजविनि निर्देशेऽर्पितमनाः ।
छदद्वन्द्वे यस्य ध्वनति मथुरावासिबटवो
व्यदस्यन्ते सामस्वरजनितमन्योन्यकलहम् ॥
अन्वयः
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विहङ्ग-इन्द्रः भुवि पुरः युग्मी-कृत-कर-सरोजः कृत-आसङ्गः प्रजविनि निर्देशे अर्पित-मनाः भावी, यस्य छद-द्वन्द्वे ध्वनति मथुरा-वासि-बटवः साम-स्वर-जनित-अन्योन्य-कलहम् व्यदस्यन्ते।
Summary
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The King of Birds, *Garuḍa*, will be standing before him on the ground with his lotus-like palms joined, his mind fixed on receiving a swift command. When his two wings flutter, the young students of *Mathurā* will cease their mutual disputes over the chanting of the *Sāmaveda*.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ह | ङ्गे | न्द्रो | यु | ग्मी | कृ | त | क | र | स | रो | जो | भु | वि | पु | रः |
| कृ | ता | स | ङ्गो | भा | वी | प्र | ज | वि | नि | नि | र्दे | शे | ऽर्पि | त | म | नाः |
| छ | द | द्व | न्द्वे | य | स्य | ध्व | न | ति | म | थु | रा | वा | सि | ब | ट | वो |
| व्य | द | स्य | न्ते | सा | म | स्व | र | ज | नि | त | म | न्यो | न्य | क | ल | हम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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