विकद्रुः पौराणीरखिलकुलवृद्धो यदुपतेर्
अदूरादासीनो मधुरभनितीर्गास्यति सदा ।
पुरस्तादाभीरीगणभयदनामा स कठिनो
मणिस्तम्भालम्बी कुरुकुलकथां सङ्कलयिता ॥
विकद्रुः पौराणीरखिलकुलवृद्धो यदुपतेर्
अदूरादासीनो मधुरभनितीर्गास्यति सदा ।
पुरस्तादाभीरीगणभयदनामा स कठिनो
मणिस्तम्भालम्बी कुरुकुलकथां सङ्कलयिता ॥
अदूरादासीनो मधुरभनितीर्गास्यति सदा ।
पुरस्तादाभीरीगणभयदनामा स कठिनो
मणिस्तम्भालम्बी कुरुकुलकथां सङ्कलयिता ॥
अन्वयः
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यदु-पतेः अदूरात् आसीनः अखिल-कुल-वृद्धः विकद्रुः सदा पौराणीः मधुर-भनितीः गास्यति, पुरस्तात् आभीरी-गण-भय-द-नामा सः कठिनः मणि-स्तम्भ-आलम्बी कुरु-कुल-कथाम् सङ्कलयिता।
Summary
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Seated near the Lord of the *Yadus*, the elder *Vikadru* will be reciting sweet mythological tales. In front, leaning against a jeweled pillar, will be the firm narrator who strikes fear into the cowherd girls by his very name, *Akrūra*, recounting the history of the *Kuru* dynasty.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | क | द्रुः | पौ | रा | णी | र | खि | ल | कु | ल | वृ | द्धो | य | दु | प | ते |
| र | दू | रा | दा | सी | नो | म | धु | र | भ | नि | ती | र्गा | स्य | ति | स | दा |
| पु | र | स्ता | दा | भी | री | ग | ण | भ | य | द | ना | मा | स | क | ठि | नो |
| म | णि | स्त | म्भा | ल | म्बी | कु | रु | कु | ल | क | थां | स | ङ्क | ल | यि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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