उदञ्चत् कालिन्दीसलिलसुभगं भावुकरुचिः
कपोलान्तः प्रेक्ष्यन्मणिमकरमुद्रामधुरिमा ।
वसानः कौशेयं जितकनकलक्ष्मी परिमलं
मुकुन्दस्ते साक्षात् प्रमदसुधया सेक्ष्यति दृशोः ॥
उदञ्चत् कालिन्दीसलिलसुभगं भावुकरुचिः
कपोलान्तः प्रेक्ष्यन्मणिमकरमुद्रामधुरिमा ।
वसानः कौशेयं जितकनकलक्ष्मी परिमलं
मुकुन्दस्ते साक्षात् प्रमदसुधया सेक्ष्यति दृशोः ॥
कपोलान्तः प्रेक्ष्यन्मणिमकरमुद्रामधुरिमा ।
वसानः कौशेयं जितकनकलक्ष्मी परिमलं
मुकुन्दस्ते साक्षात् प्रमदसुधया सेक्ष्यति दृशोः ॥
अन्वयः
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उदञ्चत्-कालिन्दी-सलिल-सुभगम् भावुक-रुचिः कपोल-अन्तः प्रेक्ष्यन्-मणि-मकर-मुद्रा-मधुरिमा जित-कनक-लक्ष्मी-परिमलम् कौशेयम् वसानः मुकुन्दः ते साक्षात् प्रमद-सुधया दृशोः सेक्ष्यति।
Summary
AI
*Mukunda*, possessing a charm as beautiful as the rising waters of the *Kālindī* and a sweetness reflected in the jewel-encrusted shark-shaped earrings against his cheeks, wearing silk that surpasses the brilliance and fragrance of gold, will sprinkle the nectar of joy directly into your eyes.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | ञ्च | त्का | लि | न्दी | स | लि | ल | सु | भ | गं | भा | वु | क | रु | चिः |
| क | पो | ला | न्तः | प्रे | क्ष्य | न्म | णि | म | क | र | मु | द्रा | म | धु | रि | मा |
| व | सा | नः | कौ | शे | यं | जि | त | क | न | क | ल | क्ष्मी | प | रि | म | लं |
| मु | कु | न्द | स्ते | सा | क्षा | त्प्र | म | द | सु | ध | या | से | क्ष्य | ति | दृ | शोः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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