ततस्तां न्यस्ताङ्गीमुरसि ललितायाः कमलिनी
पलाशैः कालिन्दीसलिलशिशिरैर्वीजिततनुम् ।
परावृतश्वासाङ्कुरचलितकण्ठिं कलयतां
सखीसन्दोहानां प्रमदभरशाली ध्वनिरभूत् ॥
ततस्तां न्यस्ताङ्गीमुरसि ललितायाः कमलिनी
पलाशैः कालिन्दीसलिलशिशिरैर्वीजिततनुम् ।
परावृतश्वासाङ्कुरचलितकण्ठिं कलयतां
सखीसन्दोहानां प्रमदभरशाली ध्वनिरभूत् ॥
पलाशैः कालिन्दीसलिलशिशिरैर्वीजिततनुम् ।
परावृतश्वासाङ्कुरचलितकण्ठिं कलयतां
सखीसन्दोहानां प्रमदभरशाली ध्वनिरभूत् ॥
अन्वयः
AI
ततः ललितायाः उरसि न्यस्त-अङ्गीम्, कालिन्दी-सलिल-शिशिरैः कमलिनी-पलाशैः वीजित-तनुम्, परावृत्त-श्वास-अङ्कुर-चलित-कण्ठिं ताम् कलयतां सखी-सन्दोहानाम् प्रमद-भर-शाली ध्वनिः अभूत्।
Summary
AI
Then, as Rādhā lay with her limbs resting on Lalitā's lap, her body was fanned with lotus petals cooled by the waters of the Yamunā. When her friends noticed her throat move with the first sprouts of returning breath, a joyous shout erupted from the circle of companions, celebrating her return to consciousness.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्तां | न्य | स्ता | ङ्गी | मु | र | सि | ल | लि | ता | याः | क | म | लि | नी |
| प | ला | शैः | का | लि | न्दी | स | लि | ल | शि | शि | रै | र्वी | जि | त | त | नुम् |
| प | रा | वृ | त | श्वा | सा | ङ्कु | र | च | लि | त | क | ण्ठिं | क | ल | य | तां |
| स | खी | स | न्दो | हा | नां | प्र | म | द | भ | र | शा | ली | ध्व | नि | र | भूत् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.