ततो मध्ये कक्षं प्रति नवगवाक्षस्तवकिनं
चलन्मुक्तालम्बस्फुरितममलस्तम्भनिवहम् ।
भवान् द्रष्टा हेमोल्लिखितदशमस्कन्धचरितो-
ल्लसद्भित्तिप्रान्तं मुरविजयिनः केलिनिलयम् ॥
ततो मध्ये कक्षं प्रति नवगवाक्षस्तवकिनं
चलन्मुक्तालम्बस्फुरितममलस्तम्भनिवहम् ।
भवान् द्रष्टा हेमोल्लिखितदशमस्कन्धचरितो-
ल्लसद्भित्तिप्रान्तं मुरविजयिनः केलिनिलयम् ॥
चलन्मुक्तालम्बस्फुरितममलस्तम्भनिवहम् ।
भवान् द्रष्टा हेमोल्लिखितदशमस्कन्धचरितो-
ल्लसद्भित्तिप्रान्तं मुरविजयिनः केलिनिलयम् ॥
अन्वयः
AI
ततः मध्ये कक्षम् प्रति नव-गवाक्ष-स्तबकिनम् चलत्-मुक्ता-आलम्ब-स्फुरितम् अमल-स्तम्भ-निवहम् हेम-उल्लिखित-दशम-स्कन्ध-चरित-उल्लसत्-भित्ति-प्रान्तम् मुर-विजयिनः केलि-निलयम् भवान् द्रष्टा।
Summary
AI
Then, in the central courtyard, you will see the pleasure-chamber of the Conqueror of *Mura*. It is adorned with clusters of new latticed windows, shimmering with hanging pearls and rows of spotless pillars. Its walls glisten with the deeds from the Tenth Canto of the *Bhāgavata Purāṇa* etched in gold.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | म | ध्ये | क | क्षं | प्र | ति | न | व | ग | वा | क्ष | स्त | व | कि | नं |
| च | ल | न्मु | क्ता | ल | म्ब | स्फु | रि | त | म | म | ल | स्त | म्भ | नि | व | हम् |
| भ | वा | न्द्र | ष्टा | हे | मो | ल्लि | खि | त | द | श | म | स्क | न्ध | च | रि | तो |
| ल्ल | स | द्भि | त्ति | प्रा | न्तं | मु | र | वि | ज | यि | नः | के | लि | नि | ल | यम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.