घनश्यामा भ्राम्यत्य् उपरि हरिहर्मस्य शिखिभिः
कृतस्तोत्रा मुग्धैरगुरुरचिता धूमलतिका ।
तदालोकाद्धीर स्फुरति तव चेन् मानसरुचिर्
जितं तर्हि स्वैरं जलसहनिवासप्रियतया ॥
घनश्यामा भ्राम्यत्य् उपरि हरिहर्मस्य शिखिभिः
कृतस्तोत्रा मुग्धैरगुरुरचिता धूमलतिका ।
तदालोकाद्धीर स्फुरति तव चेन् मानसरुचिर्
जितं तर्हि स्वैरं जलसहनिवासप्रियतया ॥
कृतस्तोत्रा मुग्धैरगुरुरचिता धूमलतिका ।
तदालोकाद्धीर स्फुरति तव चेन् मानसरुचिर्
जितं तर्हि स्वैरं जलसहनिवासप्रियतया ॥
अन्वयः
AI
हरि-हर्मस्य उपरि मुग्धैः शिखिभिः कृत-स्तोत्रा अगुरु-रचिता घन-श्यामा धूम-लतिका भ्राम्यति, तत्-आलोकात् तव मानस-रुचिः धीर स्फुरति चेत्, तर्हि जल-सह-निवास-प्रियतया स्वैरम् जितम्।
Summary
AI
Dark incense smoke, resembling a thick cloud, wafts above *Hari*’s palace while innocent peacocks sing praises to it. If your heart's desire is awakened by the sight of this cloud, then your innate love for residing near water has truly triumphed over your steady mind.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घ | न | श्या | मा | भ्रा | म्य | त्यु | प | रि | ह | रि | ह | र्म | स्य | शि | खि | भिः |
| कृ | त | स्तो | त्रा | मु | ग्धै | र | गु | रु | र | चि | ता | धू | म | ल | ति | का |
| त | दा | लो | का | द्धी | र | स्फु | र | ति | त | व | चे | न्मा | न | स | रु | चि |
| र्जि | तं | त | र्हि | स्वै | रं | ज | ल | स | ह | नि | वा | स | प्रि | य | त | या |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.