विषादं मा कार्षीद्रुतिमवितत्थव्याहृतिरसौ
समागन्ता राधे धृतनवशिखण्डस्तव सखा ।
इति ब्रूते यस्यां शुकमिथुनमिन्द्रानुजकृते
यदाभीरिवृन्दैरुपधृतमभूदुद्धवकरे ॥
विषादं मा कार्षीद्रुतिमवितत्थव्याहृतिरसौ
समागन्ता राधे धृतनवशिखण्डस्तव सखा ।
इति ब्रूते यस्यां शुकमिथुनमिन्द्रानुजकृते
यदाभीरिवृन्दैरुपधृतमभूदुद्धवकरे ॥
समागन्ता राधे धृतनवशिखण्डस्तव सखा ।
इति ब्रूते यस्यां शुकमिथुनमिन्द्रानुजकृते
यदाभीरिवृन्दैरुपधृतमभूदुद्धवकरे ॥
अन्वयः
AI
राधे! विषादम् मा कार्षीत्, असौ धृत-नव-शिखण्डः तव सखा द्रुति-अवितत्थ-व्याहृतिः समागन्ता, इति यस्याम् शुक-मिथुनम् इन्द्र-अनुज-कृते ब्रूते, यत् आभीरी-वृन्दैः उद्धव-करे उपधृतम् अभूत्।
Summary
AI
"O *Rādhā*, do not grieve! Your friend, adorned with a fresh peacock feather and speaking words of swift truth, will soon arrive." In that city, pairs of parrots repeat these words for the sake of *Upendra*, which were once offered into the hands of *Uddhava* by the *Gopīs*.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | षा | दं | मा | का | र्षी | द्रु | ति | म | वि | त | त्थ | व्या | हृ | ति | र | सौ |
| स | मा | ग | न्ता | रा | धे | धृ | त | न | व | शि | ख | ण्ड | स्त | व | स | खा |
| इ | ति | ब्रू | ते | य | स्यां | शु | क | मि | थु | न | मि | न्द्रा | नु | ज | कृ | ते |
| य | दा | भी | रि | वृ | न्दै | रु | प | धृ | त | म | भू | दु | द्ध | व | क | रे |
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