चिरान् मृग्यन्तीनां पशुपरमणीनामपि कुलैर्
अलब्धं कालिन्दीपुलिनविपिने लीनमण्डितः ।
सदा लोकोल्लासिस्मितपरिचितास्यं सहचरि
स्फुरन्तं वीक्षिष्ये पुनरपि किमग्रे मुरभिदम् ॥
चिरान् मृग्यन्तीनां पशुपरमणीनामपि कुलैर्
अलब्धं कालिन्दीपुलिनविपिने लीनमण्डितः ।
सदा लोकोल्लासिस्मितपरिचितास्यं सहचरि
स्फुरन्तं वीक्षिष्ये पुनरपि किमग्रे मुरभिदम् ॥
अलब्धं कालिन्दीपुलिनविपिने लीनमण्डितः ।
सदा लोकोल्लासिस्मितपरिचितास्यं सहचरि
स्फुरन्तं वीक्षिष्ये पुनरपि किमग्रे मुरभिदम् ॥
अन्वयः
AI
सहचरि! चिरान् मृग्यन्तीनाम् पशु-परमणीनाम अपि कुलैः अलब्धम् कालिन्दी-पुलिन-विपिने लीन-मण्डितः सदा लोक-उल्लासि-स्मित-परिचित-आस्यम् स्फुरन्तम् मुर-भिदम् किम् पुनः अपि अग्रे वीक्षिष्ये?
Summary
AI
O friend! Shall I ever again behold *Murabhid* standing before me? He, who remained hidden and adorned in the groves on the banks of the *Kālindī*, was never found by the many cowherd girls despite their long search. His face is ever familiar with a smile that gladdens the world.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चि | रा | न्मृ | ग्य | न्ती | नां | प | शु | प | र | म | णी | ना | म | पि | कु | लै |
| र | ल | ब्धं | का | लि | न्दी | पु | लि | न | वि | पि | ने | ली | न | म | ण्डि | तः |
| स | दा | लो | को | ल्ला | सि | स्मि | त | प | रि | चि | ता | स्यं | स | ह | च | रि |
| स्फु | र | न्तं | वी | क्षि | ष्ये | पु | न | र | पि | कि | म | ग्रे | मु | र | भि | दम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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