सखे साक्षाद्दामोदरवदनचन्द्रावकलन-
स्फुरत्प्रेमानन्दप्रकरलहरीचुम्बितधियः ।
मुहुरत्राभीरीसमुदयशिरोन्यस्तविपद-
स्तवाक्ष्णोरानन्दं विदधीत पुरा पौरवनिताः ॥
सखे साक्षाद्दामोदरवदनचन्द्रावकलन-
स्फुरत्प्रेमानन्दप्रकरलहरीचुम्बितधियः ।
मुहुरत्राभीरीसमुदयशिरोन्यस्तविपद-
स्तवाक्ष्णोरानन्दं विदधीत पुरा पौरवनिताः ॥
स्फुरत्प्रेमानन्दप्रकरलहरीचुम्बितधियः ।
मुहुरत्राभीरीसमुदयशिरोन्यस्तविपद-
स्तवाक्ष्णोरानन्दं विदधीत पुरा पौरवनिताः ॥
अन्वयः
AI
सखे साक्षात् दामोदर-वदन-चन्द्र-अवकलन-स्फुरत्-प्रेम-आनन्द-प्रकर-लहरी-चुम्बित-धियः मुहुः अत्र आभीरी-समुदय-शिरः-न्यस्त-विपदः पौर-वनिताः तव अक्ष्णोः आनन्दं विदधीत ॥
Summary
AI
O friend, the women of the city will bring delight to your eyes. Their minds are touched by waves of intense bliss and love arising from the sight of *Dāmodara’s* moon-like face, even as they repeatedly cast misfortunes upon the heads of the gathered cowherd women through their envy.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | खे | सा | क्षा | द्दा | मो | द | र | व | द | न | च | न्द्रा | व | क | ल | न |
| स्फु | र | त्प्रे | मा | न | न्द | प्र | क | र | ल | ह | री | चु | म्बि | त | धि | यः |
| मु | हु | र | त्रा | भी | री | स | मु | द | य | शि | रो | न्य | स्त | वि | प | द |
| स्त | वा | क्ष्णो | रा | न | न्दं | वि | द | धी | त | पु | रा | पौ | र | व | नि | ताः |
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