विलज्जं मा रोदीरिह सखि पुनर्यास्यति हरि-
स्तवापङ्गक्रीडानिविडपरिचर्याग्रहिलताम् ।
इति स्वैरं यस्यां पथि पथि मुरारेरभिनव-
प्रवेशे नारीणां रतिरभसजल्पा ववृधिरे ॥
विलज्जं मा रोदीरिह सखि पुनर्यास्यति हरि-
स्तवापङ्गक्रीडानिविडपरिचर्याग्रहिलताम् ।
इति स्वैरं यस्यां पथि पथि मुरारेरभिनव-
प्रवेशे नारीणां रतिरभसजल्पा ववृधिरे ॥
स्तवापङ्गक्रीडानिविडपरिचर्याग्रहिलताम् ।
इति स्वैरं यस्यां पथि पथि मुरारेरभिनव-
प्रवेशे नारीणां रतिरभसजल्पा ववृधिरे ॥
अन्वयः
AI
सखि इह विलज्जं मा रोदीः । हरिः पुनः तव अपाङ्ग-क्रीडा-निविड-परिचर्या-ग्रहिलतां यास्यति । इति यस्यां पथि पथि मुरारेः अभिनव-प्रवेशे नारीणां रति-रभस-जल्पाः स्वैरं ववृधिरे ॥
Summary
AI
"O friend, do not weep so shamelessly here! *Hari* will once again become eager for the intense service of your playful glances." Such passionate talk among the women increased freely on every path during the fresh arrival of *Murāri* in the city.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ल | ज्जं | मा | रो | दी | रि | ह | स | खि | पु | न | र्या | स्य | ति | ह | रि |
| स्त | वा | प | ङ्ग | क्री | डा | नि | वि | ड | प | रि | च | र्या | ग्र | हि | ल | ताम् |
| इ | ति | स्वै | रं | य | स्यां | प | थि | प | थि | मु | रा | रे | र | भि | न | व |
| प्र | वे | शे | ना | री | णां | र | ति | र | भ | स | ज | ल्पा | व | वृ | धि | रे |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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