असव्यं बिभ्राणा पदमधूतलाक्षारसमसौ
प्रयाताहं मुग्धे विरम मम वेशैः किमधुना ।
अमन्दादाशङ्के सखि पुरपुरन्ध्रिकलकलाद्
अलिन्दाग्रे वृन्दावनकुसुमधन्वा विजयते ॥
असव्यं बिभ्राणा पदमधूतलाक्षारसमसौ
प्रयाताहं मुग्धे विरम मम वेशैः किमधुना ।
अमन्दादाशङ्के सखि पुरपुरन्ध्रिकलकलाद्
अलिन्दाग्रे वृन्दावनकुसुमधन्वा विजयते ॥
प्रयाताहं मुग्धे विरम मम वेशैः किमधुना ।
अमन्दादाशङ्के सखि पुरपुरन्ध्रिकलकलाद्
अलिन्दाग्रे वृन्दावनकुसुमधन्वा विजयते ॥
अन्वयः
AI
असौ पदम् असव्यं बिभ्राणा अधूत-लाक्षा-रसं मुग्धे प्रयाता अहम् । सखि अधुना मम वेशैः किं विरम । अमन्दात् पुर-पुरन्ध्रि-कलकलात् आशङ्के अलिन्द-अग्रे वृन्दावन-कुसुमधन्वा विजयते ॥
Summary
AI
This woman has set her left foot forward with the lac-dye still wet, and I, too, have rushed out, O naive one! Stop, what is the use of my ornaments now? From the loud clamor of the city women, I suspect that the Cupid of *Vṛndāvana* is triumphantly standing at the front of the terrace.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स | व्यं | बि | भ्रा | णा | प | द | म | धू | त | ला | क्षा | र | स | म | सौ |
| प्र | या | ता | हं | मु | ग्धे | वि | र | म | म | म | वे | शैः | कि | म | धु | ना |
| अ | म | न्दा | दा | श | ङ्के | स | खि | पु | र | पु | र | न्ध्रि | क | ल | क | ला |
| द | लि | न्दा | ग्रे | वृ | न्दा | व | न | कु | सु | म | ध | न्वा | वि | ज | य | ते |
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