अयं लीलापाङ्गस्नपितपुरवीथीपरिसरो
नवाशोकोत्तंसश्चलति पुरतः कंसविजयी ।
किमस्मान् एतस्मिन् मणिभवनपृष्ठाद्विनुदती
त्वमेका स्तब्धाक्षी स्थगयसि गवाक्षावलिमपि ॥
अयं लीलापाङ्गस्नपितपुरवीथीपरिसरो
नवाशोकोत्तंसश्चलति पुरतः कंसविजयी ।
किमस्मान् एतस्मिन् मणिभवनपृष्ठाद्विनुदती
त्वमेका स्तब्धाक्षी स्थगयसि गवाक्षावलिमपि ॥
नवाशोकोत्तंसश्चलति पुरतः कंसविजयी ।
किमस्मान् एतस्मिन् मणिभवनपृष्ठाद्विनुदती
त्वमेका स्तब्धाक्षी स्थगयसि गवाक्षावलिमपि ॥
अन्वयः
AI
अयं लीला-अपाङ्ग-स्नपित-पुर-वीथी-परिसरः नव-अशोक-उत्तंसः कंस-विजयी पुरतः चलति । त्वम् एका स्तब्ध-अक्षी मणि-भवन-पृष्ठात् अस्मान् विनुदती गवाक्ष-आवलिम् अपि किम् स्थगयसि ॥
Summary
AI
Here moves the Conqueror of *Kaṃsa*, wearing a fresh *Aśoka* flower behind His ear and bathing the city streets with His playful sidelong glances. Why do you, with fixed eyes, push us away from the balcony of the jeweled palace and block the view through the windows?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यं | ली | ला | पा | ङ्ग | स्न | पि | त | पु | र | वी | थी | प | रि | स | रो |
| न | वा | शो | को | त्तं | स | श्च | ल | ति | पु | र | तः | कं | स | वि | ज | यी |
| कि | म | स्मा | ने | त | स्मि | न्म | णि | भ | व | न | पृ | ष्ठा | द्वि | नु | द | ती |
| त्व | मे | का | स्त | ब्धा | क्षी | स्थ | ग | य | सि | ग | वा | क्षा | व | लि | म | पि |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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