वृषः शम्भोर्यस्यां दशति नवमेकत्र यवसं
विरिञ्चेरन्यस्मिन् गिलति कलहंसो विसलताम् ।
क्वचित् क्रोञ्चारातेः कवलयति केकी विषधरं
विलीढे शल्लक्या वलरिपुकरी पल्लवमितः ॥
वृषः शम्भोर्यस्यां दशति नवमेकत्र यवसं
विरिञ्चेरन्यस्मिन् गिलति कलहंसो विसलताम् ।
क्वचित् क्रोञ्चारातेः कवलयति केकी विषधरं
विलीढे शल्लक्या वलरिपुकरी पल्लवमितः ॥
विरिञ्चेरन्यस्मिन् गिलति कलहंसो विसलताम् ।
क्वचित् क्रोञ्चारातेः कवलयति केकी विषधरं
विलीढे शल्लक्या वलरिपुकरी पल्लवमितः ॥
अन्वयः
AI
यस्यां एकत्र शम्भोः वृषः नवं यवसं दशति अन्यस्मिन् विरिञ्चेः कल-हंसः विस-लतां गिलति । क्वचित् क्रोञ्च-अरातेः केकी विष-धरं कवलयति इतः वल-रिपु-करी शल्लक्या पल्लवम् विलीढे ॥
Summary
AI
In that city, *Śiva’s* bull grazes on fresh grass in one place, while elsewhere *Brahmā’s* swan swallows lotus stalks. In another spot, *Kārttikeya’s* peacock devours a snake, and here, *Indra’s* elephant tastes the tender shoots of the *Śallakī* tree.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृ | षः | श | म्भो | र्य | स्यां | द | श | ति | न | व | मे | क | त्र | य | व | सं |
| वि | रि | ञ्चे | र | न्य | स्मि | न्गि | ल | ति | क | ल | हं | सो | वि | स | ल | ताम् |
| क्व | चि | त्क्रो | ञ्चा | रा | तेः | क | व | ल | य | ति | के | की | वि | ष | ध | रं |
| वि | ली | ढे | श | ल्ल | क्या | व | ल | रि | पु | क | री | प | ल्ल | व | मि | तः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.