निकेतैराकीर्णा गिरिशगिरिडिम्भप्रतिभटैर्
अवष्टम्भस्तम्भावलिविलसितैः पुष्पितवना ।
निविष्टा कालिन्दीतटभुवि तवाधासाति सखे
समस्तादानन्दं मधुरजलवृन्दा मधुपुरी ॥
निकेतैराकीर्णा गिरिशगिरिडिम्भप्रतिभटैर्
अवष्टम्भस्तम्भावलिविलसितैः पुष्पितवना ।
निविष्टा कालिन्दीतटभुवि तवाधासाति सखे
समस्तादानन्दं मधुरजलवृन्दा मधुपुरी ॥
अवष्टम्भस्तम्भावलिविलसितैः पुष्पितवना ।
निविष्टा कालिन्दीतटभुवि तवाधासाति सखे
समस्तादानन्दं मधुरजलवृन्दा मधुपुरी ॥
अन्वयः
AI
गिरिश-गिरि-डिम्भ-प्रतिभटैः अवष्टम्भ-स्तम्भ-आवलि-विलसितैः निकेतैः आकीर्णा पुष्पित-वना कालिन्दी-तट-भुवि निविष्टा सा मधु-पुरी सखे तव समस्तात् मधुर-जल-वृन्दा आनन्दं आधास्यति ॥
Summary
AI
O friend, that city of *Mathurā*, situated on the banks of the *Kālindī* and filled with flowering forests, will grant you total bliss. Its mansions, adorned with rows of sturdy pillars, rival the peaks of *Śiva’s* mountain and abound in sweet waters.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | के | तै | रा | की | र्णा | गि | रि | श | गि | रि | डि | म्भ | प्र | ति | भ | टै |
| र | व | ष्ट | म्भ | स्त | म्भा | व | लि | वि | ल | सि | तैः | पु | ष्पि | त | व | ना |
| नि | वि | ष्टा | का | लि | न्दी | त | ट | भु | वि | त | वा | धा | सा | ति | स | खे |
| स | म | स्ता | दा | न | न्दं | म | धु | र | ज | ल | वृ | न्दा | म | धु | पु | री |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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