शरन्मेघश्रेणीप्रतिभटमरिष्टासुरशिरश्
चिरं शुष्कं वृन्दावनपरिसरे द्रक्ष्यति भवान् ।
यदारोढुं दूरान् मिलति किल कैलासशिखरि-
भ्रमाक्रान्तस्वान्तो गिरिशसुहृदः किङ्करगणः ॥
शरन्मेघश्रेणीप्रतिभटमरिष्टासुरशिरश्
चिरं शुष्कं वृन्दावनपरिसरे द्रक्ष्यति भवान् ।
यदारोढुं दूरान् मिलति किल कैलासशिखरि-
भ्रमाक्रान्तस्वान्तो गिरिशसुहृदः किङ्करगणः ॥
चिरं शुष्कं वृन्दावनपरिसरे द्रक्ष्यति भवान् ।
यदारोढुं दूरान् मिलति किल कैलासशिखरि-
भ्रमाक्रान्तस्वान्तो गिरिशसुहृदः किङ्करगणः ॥
अन्वयः
AI
शरद-मेघ-श्रेणी-प्रतिभटं चिरं शुष्कं अरिष्ट-असुर-शिरः वृन्दावन-परिसरे भवान् द्रक्ष्यति । यत् आरोढुम् गिरिश-सुहृदः किङ्कर-गणः दूरात् कैलास-शिखरि-भ्रम-आक्रान्त-स्वान्तः किल मिलति ॥
Summary
AI
In the vicinity of *Vṛndāvana*, you will see the long-dried head of the demon *Ariṣṭa*, which rivals a row of autumn clouds. Mistaking it for a peak of Mount *Kailāsa*, the attendants of *Śiva* gather from afar to climb it.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | र | न्मे | घ | श्रे | णी | प्र | ति | भ | ट | म | रि | ष्टा | सु | र | शि | र |
| श्चि | रं | शु | ष्कं | वृ | न्दा | व | न | प | रि | स | रे | द्र | क्ष्य | ति | भ | वान् |
| य | दा | रो | ढुं | दू | रा | न्मि | ल | ति | कि | ल | कै | ला | स | शि | ख | रि |
| भ्र | मा | क्रा | न्त | स्वा | न्तो | गि | रि | श | सु | हृ | दः | कि | ङ्क | र | ग | णः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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