तदन्ते श्रीकान्तस्मरणसमरघाटीपुलकिता
कदम्बानां वाटी रसिकपरिपाटी स्फुरयति ।
त्वमासीनस्तस्यां न यदि परितो नन्दसि ततो
बभूव व्यर्था ते घनरसनिवासव्यसनिता ॥
तदन्ते श्रीकान्तस्मरणसमरघाटीपुलकिता
कदम्बानां वाटी रसिकपरिपाटी स्फुरयति ।
त्वमासीनस्तस्यां न यदि परितो नन्दसि ततो
बभूव व्यर्था ते घनरसनिवासव्यसनिता ॥
कदम्बानां वाटी रसिकपरिपाटी स्फुरयति ।
त्वमासीनस्तस्यां न यदि परितो नन्दसि ततो
बभूव व्यर्था ते घनरसनिवासव्यसनिता ॥
अन्वयः
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तत्-अन्ते श्री-कान्त-स्मरण-समर-घाटी-पुलकिता रसिक-परिपाटी कदम्बानां वाटी स्फुरयति । त्वम् तस्यां आसीनः परितः न नन्दसि ततः ते घण-रस-निवास-व्यसनिता व्यर्था बभूव ॥
Summary
AI
Beyond that lies the grove of *Kadamba* trees, thrilled as if in a battle of memories of the Beloved of *Lakṣmī*, shining with the traditions of aesthetic connoisseurs. If you do not rejoice while resting there, then your passion for dwelling in the essence of the clouds is in vain.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | न्ते | श्री | का | न्त | स्म | र | ण | स | म | र | घा | टी | पु | ल | कि | ता |
| क | द | म्बा | नां | वा | टी | र | सि | क | प | रि | पा | टी | स्फु | र | य | ति | |
| त्व | मा | सी | न | स्त | स्यां | न | य | दि | प | रि | तो | न | न्द | सि | त | तो | |
| ब | भू | व | व्य | र्था | ते | घ | न | र | स | नि | वा | स | व्य | स | नि | ता | |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | |||||||||||
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