तमालस्यालोकाद् गिरिपरिसरे सन्ति चपलाः
पुलिन्द्यो गोविन्दस्मरणरभसोत्तप्तवपुषः ।
शनैस् तासां तापं क्षणम् अपनयन् यास्यति भवान्
अवश्यं कालिन्दीसलिलशिशिरैः पक्षपवनैः ॥
तमालस्यालोकाद् गिरिपरिसरे सन्ति चपलाः
पुलिन्द्यो गोविन्दस्मरणरभसोत्तप्तवपुषः ।
शनैस् तासां तापं क्षणम् अपनयन् यास्यति भवान्
अवश्यं कालिन्दीसलिलशिशिरैः पक्षपवनैः ॥
पुलिन्द्यो गोविन्दस्मरणरभसोत्तप्तवपुषः ।
शनैस् तासां तापं क्षणम् अपनयन् यास्यति भवान्
अवश्यं कालिन्दीसलिलशिशिरैः पक्षपवनैः ॥
अन्वयः
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गिरि-परिसरे तमालस्य आलोकात् चपलाः गोविन्द-स्मरण-रभस-उत्-तप्त-वपुषः पुलिन्द्यः सन्ति । कालिन्दी-सलिल-शिशिरैः पक्ष-पवनैः तासां तापं क्षणम् अपनयन् भवान् अवश्यं शनैः यास्यति ॥
Summary
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On the mountain slopes, the young tribal women (*Pulindīs*) become restless at the sight of the dark *Tamāla* trees, their bodies heated by the intensity of remembering *Govinda*. Cooling them for a moment with the breeze from your wings, chilled by the waters of the *Kālindī*, you must proceed slowly.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मा | ल | स्या | लो | का | द्गि | रि | प | रि | स | रे | स | न्ति | च | प | लाः |
| पु | लि | न्द्यो | गो | वि | न्द | स्म | र | ण | र | भ | सो | त्त | प्त | व | पु | षः |
| श | नै | स्ता | सां | ता | पं | क्ष | ण | म | प | न | य | न्या | स्य | ति | भ | वा |
| न | व | श्यं | का | लि | न्दी | स | लि | ल | शि | शि | रैः | प | क्ष | प | व | नैः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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