तमेवाद्रिं चक्राङ्कितकरपरिष्वङ्गिरसिकं
महीचक्रे शङ्केमहि शिखरिणां शेखरतया ।
अरातिं ज्ञातीनां ननु हरिहरं यः परिभवन्
यथार्थं स्वं नाम व्यधित गोवर्धन इति ॥
तमेवाद्रिं चक्राङ्कितकरपरिष्वङ्गिरसिकं
महीचक्रे शङ्केमहि शिखरिणां शेखरतया ।
अरातिं ज्ञातीनां ननु हरिहरं यः परिभवन्
यथार्थं स्वं नाम व्यधित गोवर्धन इति ॥
महीचक्रे शङ्केमहि शिखरिणां शेखरतया ।
अरातिं ज्ञातीनां ननु हरिहरं यः परिभवन्
यथार्थं स्वं नाम व्यधित गोवर्धन इति ॥
अन्वयः
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चक्र-अङ्कित-कर-परिष्वङ्ग-रसिकं तम् एव अद्रिं शिखरिणां शेखरतया मही-चक्रे शङ्केमहि । ननु यः ज्ञातीनां अरातिं हरि-हरं परिभवन यथार्थं स्वं नाम गोवर्धनः इति व्यधित ॥
Summary
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I consider that very mountain, which relished the touch of the hand marked with the discus, to be the crest-jewel of all mountains on earth. Indeed, by defying Indra, the enemy of his kinsmen, the mountain truly justified its name *Govardhana* (the nourisher of cows).
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मे | वा | द्रिं | च | क्रा | ङ्कि | त | क | र | प | रि | ष्व | ङ्गि | र | सि | कं |
| म | ही | च | क्रे | श | ङ्के | म | हि | शि | ख | रि | णां | शे | ख | र | त | या |
| अ | रा | तिं | ज्ञा | ती | नां | न | नु | ह | रि | ह | रं | यः | प | रि | भ | व |
| न्य | था | र्थं | स्वं | ना | म | व्य | धि | त | गो | व | र्ध | न | इ | ति | ||
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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