यदा यातो गोपीहृदयमदनो नन्दसदनान्
मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुविन्दन् मधुपुरीम् ।
तदामान्क्षीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयैर्
अगाधायां बाधामयपयसि राधा विरहिणी ॥
यदा यातो गोपीहृदयमदनो नन्दसदनान्
मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुविन्दन् मधुपुरीम् ।
तदामान्क्षीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयैर्
अगाधायां बाधामयपयसि राधा विरहिणी ॥
मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुविन्दन् मधुपुरीम् ।
तदामान्क्षीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयैर्
अगाधायां बाधामयपयसि राधा विरहिणी ॥
अन्वयः
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यदा गोपी-हृदय-मदनः मुकुन्दः गान्दिन्याः तनयम् अनुविन्दन् नन्द-सदनात् मधुपुरीं यातः, तदा विरहिणी राधा अगाधायां बाधामय-पयसि चिन्ता-सरिति घन-घूर्णा-परिचयैः आमान्क्षीत्।
Summary
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When Kṛṣṇa, the enchanter of the gopīs' hearts, left Nanda's abode for Mathurā with Akrūra, the separated Rādhā sank deep into the bottomless river of anxiety. Its waters were filled with suffering, and she was tossed about by the intense whirlpools of her own grief.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | या | तो | गो | पी | हृ | द | य | म | द | नो | न | न्द | स | द | ना |
| न्मु | कु | न्दो | गा | न्दि | न्या | स्त | न | य | म | नु | वि | न्द | न्म | धु | पु | रीम् |
| त | दा | मा | न्क्षी | च्चि | न्ता | स | रि | ति | घ | न | घू | र्णा | प | रि | च | यै |
| र | गा | धा | यां | बा | धा | म | य | प | य | सि | रा | धा | वि | र | हि | णी |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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