प्रपन्नः प्रेमाणं प्रभवति सदा भागवतभाक्
पराचीनो जन्मावधिभवरसाद्भक्तिमधुरः ।
चिरं कोऽपि श्रीमान् जयति विदितः शाकरतया
धुरीणो धीराणामधिधरणि वैयासकिरिव ॥
प्रपन्नः प्रेमाणं प्रभवति सदा भागवतभाक्
पराचीनो जन्मावधिभवरसाद्भक्तिमधुरः ।
चिरं कोऽपि श्रीमान् जयति विदितः शाकरतया
धुरीणो धीराणामधिधरणि वैयासकिरिव ॥
पराचीनो जन्मावधिभवरसाद्भक्तिमधुरः ।
चिरं कोऽपि श्रीमान् जयति विदितः शाकरतया
धुरीणो धीराणामधिधरणि वैयासकिरिव ॥
अन्वयः
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जन्मावधि भवरसात् पराचीनः प्रपन्नः सदा प्रेमाणम् प्रभवति भागवत-भाक् भक्ति-मधुरः शाकरतया विदितः धीराणाम् धुरीणः अधिधरणि वैयासकिः इव कः अपि श्रीमान् चिरं जयति।
Summary
AI
May that glorious personage, who is averse to worldly pleasures from birth, surrendered to the Lord, and constantly manifests divine love, be victorious on this earth for a long time. Like Vaiyāsaki, he is steeped in the sweetness of devotion, a leader among the wise, and is renowned for his purity.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | प | न्नः | प्रे | मा | णं | प्र | भ | व | ति | स | दा | भा | ग | व | त | भा |
| क्प | रा | ची | नो | ज | न्मा | व | धि | भ | व | र | सा | द्भ | क्ति | म | धु | रः |
| चि | रं | को | ऽपि | श्री | मा | न्ज | य | ति | वि | दि | तः | शा | क | र | त | या |
| धु | री | णो | धी | रा | णा | म | धि | ध | र | णि | वै | या | स | कि | रि | व |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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