अपूर्वा यस्यान्तर्विलसति मुदा सारलरुचि-
र्विवेक्तुं शक्येते सपदि मिलिते येन पयसी ।
कथं कारं युक्तो भवतु भवतस्तस्य कृतिना
विलम्बः कादम्बीरमण मथुरासङ्गमविधौ ॥
अपूर्वा यस्यान्तर्विलसति मुदा सारलरुचि-
र्विवेक्तुं शक्येते सपदि मिलिते येन पयसी ।
कथं कारं युक्तो भवतु भवतस्तस्य कृतिना
विलम्बः कादम्बीरमण मथुरासङ्गमविधौ ॥
र्विवेक्तुं शक्येते सपदि मिलिते येन पयसी ।
कथं कारं युक्तो भवतु भवतस्तस्य कृतिना
विलम्बः कादम्बीरमण मथुरासङ्गमविधौ ॥
अन्वयः
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कादम्बी-रमण! यस्य अन्तः अपूर्वा सारल-रुचिः मुदा विलसति, येन सपदि मिलिते पयसी विवेक्तुम् शक्येते, कृतिना भवतः तस्य मथुरा-सङ्गम-विधौ विलम्बः कथं-कारम् युक्तः भवतु? ॥
Summary
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'O beloved of the female swan, in whom an extraordinary beauty shines and who can instantly distinguish water from milk, how could a delay in reaching *Mathurā* be proper for an expert such as you?'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पू | र्वा | य | स्या | न्त | र्वि | ल | स | ति | मु | दा | सा | र | ल | रु | चि |
| र्वि | वे | क्तुं | श | क्ये | ते | स | प | दि | मि | लि | ते | ये | न | प | य | सी |
| क | थं | का | रं | यु | क्तो | भ | व | तु | भ | व | त | स्त | स्य | कृ | ति | ना |
| वि | ल | म्बः | का | द | म्बी | र | म | ण | म | थु | रा | स | ङ्ग | म | वि | धौ |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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