प्रणेतव्यो दृष्टेरनुभवपथं नन्दतनयो
विधेयो गोपीनां भुवनमहितानामुपकृतिः ।
इयं यामैर्गम्या चतुर मथुरापि त्रिचतुरै-
रिति द्वैधं नान्तः कलय कलहंसीकुलपते ॥
प्रणेतव्यो दृष्टेरनुभवपथं नन्दतनयो
विधेयो गोपीनां भुवनमहितानामुपकृतिः ।
इयं यामैर्गम्या चतुर मथुरापि त्रिचतुरै-
रिति द्वैधं नान्तः कलय कलहंसीकुलपते ॥
विधेयो गोपीनां भुवनमहितानामुपकृतिः ।
इयं यामैर्गम्या चतुर मथुरापि त्रिचतुरै-
रिति द्वैधं नान्तः कलय कलहंसीकुलपते ॥
अन्वयः
AI
कल-हंसी-कुल-पते! चतुर! नन्द-तनयः दृष्टेः अनुभव-पथम् प्रणेतव्यः, भुवन-महितानाम् गोपीनाम् उपकृतिः विधेया । इयम् मथुरा अपि त्रि-चतुरैः यामैः गम्या । इति अन्तः द्वैधम् मा कलय ॥
Summary
AI
'O Lord of the swans, you must bring the son of *Nanda* into your vision and serve the world-honored *Gopīs*. Clever one, even *Mathurā* is reachable in just three or four watches. Do not harbor any doubt in your heart.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | णे | त | व्यो | दृ | ष्टे | र | नु | भ | व | प | थं | न | न्द | त | न | यो |
| वि | धे | यो | गो | पी | नां | भु | व | न | म | हि | ता | ना | मु | प | कृ | तिः |
| इ | यं | या | मै | र्ग | म्या | च | तु | र | म | थु | रा | पि | त्रि | च | तु | रै |
| रि | ति | द्वै | धं | ना | न्तः | क | ल | य | क | ल | हं | सी | कु | ल | प | ते |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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