पिबन् जम्बूश्यामं मिहिरदुहितुर्वारि मधुरं
मृणालीर्भुञ्जानो हिमकरकणाकोमलरुचः ।
क्षणं हृष्टस्तिष्ठन् निविडविटपे शाखिनि सखे
सुखेन प्रस्थानं रचयतु भवान् वृष्णिनगरे ॥
पिबन् जम्बूश्यामं मिहिरदुहितुर्वारि मधुरं
मृणालीर्भुञ्जानो हिमकरकणाकोमलरुचः ।
क्षणं हृष्टस्तिष्ठन् निविडविटपे शाखिनि सखे
सुखेन प्रस्थानं रचयतु भवान् वृष्णिनगरे ॥
मृणालीर्भुञ्जानो हिमकरकणाकोमलरुचः ।
क्षणं हृष्टस्तिष्ठन् निविडविटपे शाखिनि सखे
सुखेन प्रस्थानं रचयतु भवान् वृष्णिनगरे ॥
अन्वयः
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सखे! मिहिर-दुहितुः जम्बू-श्यामं मधुरं वारि पिबन्, हिमकर-कण-कोमल-रुचः मृणालीः भुञ्जानः, शाखिनि निविड-विटपे क्षणं हृष्टः तिष्ठन्, भवान् वृष्णि-नगरे सुखेन प्रस्थानं रचयतु।
Summary
AI
O friend! Drinking the sweet, dark water of the Yamunā and feasting on lotus stalks as tender and white as moonbeams, rest happily for a moment in the thick foliage of a tree. Thus, make your journey toward the city of the Vṛṣṇis with ease.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | ब | न्ज | म्बू | श्या | मं | मि | हि | र | दु | हि | तु | र्वा | रि | म | धु | रं |
| मृ | णा | ली | र्भु | ञ्जा | नो | हि | म | क | र | क | णा | को | म | ल | रु | चः |
| क्ष | णं | हृ | ष्ट | स्ति | ष्ठ | न्नि | वि | ड | वि | ट | पे | शा | खि | नि | स | खे |
| सु | खे | न | प्र | स्था | नं | र | च | य | तु | भ | वा | न्वृ | ष्णि | न | ग | रे |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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