गलद्बाष्पासारप्लुतधवलगण्डा मृगदृशो
विदूयन्ते यत्र प्रमदमदनावेशविवशाः ।
त्वया विज्ञातव्या हरिचरणसङ्गप्रणयिनो
ध्रुवं सा चक्राङ्कीरतिसख शताङ्गस्य पदवी ॥
गलद्बाष्पासारप्लुतधवलगण्डा मृगदृशो
विदूयन्ते यत्र प्रमदमदनावेशविवशाः ।
त्वया विज्ञातव्या हरिचरणसङ्गप्रणयिनो
ध्रुवं सा चक्राङ्कीरतिसख शताङ्गस्य पदवी ॥
विदूयन्ते यत्र प्रमदमदनावेशविवशाः ।
त्वया विज्ञातव्या हरिचरणसङ्गप्रणयिनो
ध्रुवं सा चक्राङ्कीरतिसख शताङ्गस्य पदवी ॥
अन्वयः
AI
रति-सख! यत्र प्रमद-मदन-आवेश-विवशाः गलद्-बाष्प-आसार-प्लुत-धवल-गण्डाः मृग-दृशः विदूयन्ते, सा शताङ्गस्य चक्र-अङ्की पदवी त्वया हरि-चरण-सङ्ग-प्रणयिनो ध्रुवं विज्ञातव्या।
Summary
AI
O friend of love! You will surely recognize the path of the chariot by the wheel-prints. It is there that the deer-eyed gopīs, overwhelmed by the intoxication of love and despair, once grieved, their pale cheeks bathed in a downpour of falling tears.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | ल | द्बा | ष्पा | सा | र | प्लु | त | ध | व | ल | ग | ण्डा | मृ | ग | दृ | शो |
| वि | दू | य | न्ते | य | त्र | प्र | म | द | म | द | ना | वे | श | वि | व | शाः |
| त्व | या | वि | ज्ञा | त | व्या | ह | रि | च | र | ण | स | ङ्ग | प्र | ण | यि | नो |
| ध्रु | वं | सा | च | क्रा | ङ्की | र | ति | स | ख | श | ता | ङ्ग | स्य | प | द | वी |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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