इति प्रेमोद्घाटस्थपुटितवचो भङ्गिरखिलं
त्वमावेद्य क्लिद्यन् मुखपरिसरो लोचनजलैः ।
ततो गोविन्दस्य प्रतिचरणमाध्वीकपदवी-
मुपासीनो दृग्भ्यां क्षणमवदधीथाः खगपते ॥
इति प्रेमोद्घाटस्थपुटितवचो भङ्गिरखिलं
त्वमावेद्य क्लिद्यन् मुखपरिसरो लोचनजलैः ।
ततो गोविन्दस्य प्रतिचरणमाध्वीकपदवी-
मुपासीनो दृग्भ्यां क्षणमवदधीथाः खगपते ॥
त्वमावेद्य क्लिद्यन् मुखपरिसरो लोचनजलैः ।
ततो गोविन्दस्य प्रतिचरणमाध्वीकपदवी-
मुपासीनो दृग्भ्यां क्षणमवदधीथाः खगपते ॥
अन्वयः
AI
खग-पते! इति प्रेम-उद्घाट-स्फुटित-वचो-भङ्गि अखिलम् आवेद्य, लोचन-जलैः क्लिद्यन्-मुख-परिसरः सन्, ततः गोविन्दस्य प्रति-चरण-माध्वीक-पदवीम् दृग्भ्याम् क्षणम् उपासीनः अवदधीथाः ॥
Summary
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'O King of birds, having conveyed these broken words of love, with your face moistened by tears, rest your eyes on the path of nectar from *Govinda*'s feet and pay close attention.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | प्रे | मो | द्घा | ट | स्थ | पु | टि | त | व | चो | भ | ङ्गि | र | खि | लं |
| त्व | मा | वे | द्य | क्लि | द्य | न्मु | ख | प | रि | स | रो | लो | च | न | ज | लैः |
| त | तो | गो | वि | न्द | स्य | प्र | ति | च | र | ण | मा | ध्वी | क | प | द | वी |
| मु | पा | सी | नो | दृ | ग्भ्यां | क्ष | ण | म | व | द | धी | थाः | ख | ग | प | ते |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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