परिक्लेशम्लेच्छान् समदमधुपाली मधुरया
निकृन्तत्रोन्तप्रणयकलिकाखड्गलतया ।
त्वमासीनः कल्किन्निह चतुरगोपाहितरतिः
सदेशं कुर्वीथाः प्रतिमुदितवीराधिकमिदम् ॥

अन्वयः AI कल्किन्! त्वम् समद-मधु-पाली-मधुरया निकृन्तत्-ओन्त-प्रणय-कलिका-खड्ग-लतया परिक्लेश-म्लेच्छान् इह चतुर-गोप-आहित-रतिः स-देशम् इदम् प्रति-मुदित-वीरा-अधिकम् कुर्वीथाः ॥
Summary AI 'O *Kalki*, destroying the barbarians of distress with the sword-like creeper of love's buds, you, who find pleasure among the clever cowherds, should make this region even more joyful and heroic.'
छन्दः शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७
प रि क्ले श म्ले च्छा न्स म द म धु पा ली म धु र या
नि कृ न्त त्रो न्त प्र ण य क लि का ख ड्ग ल त या
त्व मा सी नः क ल्कि न्नि ह च तु र गो पा हि त र तिः
स दे शं कु र्वी थाः प्र ति मु दि त वी रा धि क मि दम्
य म न स भ ल ग
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