न रागं सर्वज्ञ क्वचिदपि विधत्ते रतिपतिं
मुहुर्द्वेष्टि द्रोहं कलयति बलादिष्टविधये ।
चिरं ध्यानासक्ता निवसति सदा सौगतरति-
स्तथाप्यस्यां हंहो सदयहृदय त्वं न दयसे ॥
न रागं सर्वज्ञ क्वचिदपि विधत्ते रतिपतिं
मुहुर्द्वेष्टि द्रोहं कलयति बलादिष्टविधये ।
चिरं ध्यानासक्ता निवसति सदा सौगतरति-
स्तथाप्यस्यां हंहो सदयहृदय त्वं न दयसे ॥
मुहुर्द्वेष्टि द्रोहं कलयति बलादिष्टविधये ।
चिरं ध्यानासक्ता निवसति सदा सौगतरति-
स्तथाप्यस्यां हंहो सदयहृदय त्वं न दयसे ॥
अन्वयः
AI
सर्व-ज्ञ! इयम् क्वचित् अपि रागम् न विधत्ते, रति-पतिम् मुहुः द्वेष्टि, इष्ट-विधये बलात् द्रोहम् कलयति । चिरम् ध्यान-आसक्ता सदा वसति, सौगत-रतिः (अस्ति) । हंहो सदय-हृदय! तथापि अस्याम् त्वम् न दयसे ॥
Summary
AI
'O Omniscient one, she feels no passion, hates the lord of love, and resists her desires. She dwells forever in meditation with Buddhist-like detachment. O compassionate one, why then do you not show mercy to her?'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | रा | गं | स | र्व | ज्ञ | क्व | चि | द | पि | वि | ध | त्ते | र | ति | प | तिं |
| मु | हु | र्द्वे | ष्टि | द्रो | हं | क | ल | य | ति | ब | ला | दि | ष्ट | वि | ध | ये |
| चि | रं | ध्या | ना | स | क्ता | नि | व | स | ति | स | दा | सौ | ग | त | र | ति |
| स्त | था | प्य | स्यां | हं | हो | स | द | य | हृ | द | य | त्वं | न | द | य | से |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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