प्रसन्नः कालोऽयं पुनरुदयितुं रासभजनै-
र्विलासिन्न् अद्यापि स्फुटमनपराधा वयमपि ।
वितन्वानः कान्तिं वपुषि शरदाकाशवलितां
कृतो न त्वं सीरध्वज भजसि वृन्दावनमिदम् ॥
प्रसन्नः कालोऽयं पुनरुदयितुं रासभजनै-
र्विलासिन्न् अद्यापि स्फुटमनपराधा वयमपि ।
वितन्वानः कान्तिं वपुषि शरदाकाशवलितां
कृतो न त्वं सीरध्वज भजसि वृन्दावनमिदम् ॥
र्विलासिन्न् अद्यापि स्फुटमनपराधा वयमपि ।
वितन्वानः कान्तिं वपुषि शरदाकाशवलितां
कृतो न त्वं सीरध्वज भजसि वृन्दावनमिदम् ॥
अन्वयः
AI
विलासिन्! रास-भजनैः पुनः उदयितुम् अयम् कालः प्रसन्नः । वयम् अपि अद्यापि स्फुटम् अनपराधाः । शरत्-आकाश-वलिताम् कान्तिम् वपुषि वितन्वानः अपि सीर-ध्वज! त्वम् कृतः इदम् वृन्दावनम् न भजसि ॥
Summary
AI
'O playful one, the time is favorable for the *Rāsa* dance to rise again. We remain blameless. O *Haladhara*, though spreading a luster like the autumnal sky over your body, why do you not visit this *Vṛndāvana*?'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | स | न्नः | का | लो | ऽयं | पु | न | रु | द | यि | तुं | रा | स | भ | ज | नै |
| र्वि | ला | सि | न्न | द्या | पि | स्फु | ट | म | न | प | रा | धा | व | य | म | पि |
| वि | त | न्वा | नः | का | न्तिं | व | पु | षि | श | र | दा | का | श | व | लि | तां |
| कृ | तो | न | त्वं | सी | र | ध्व | ज | भ | ज | सि | वृ | न्दा | व | न | मि | दम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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