निरानन्दा गावश्चिरमुपसृता दूषणकुलैः
खरायन्ते सद्यो रघुतिलक गोवर्धनतटीः ।
विराधत्वं घोषो व्रजति भवदीयप्रवसना-
दिदानीं मारीचः स्फुटमिह नरीणर्ति परितः ॥
निरानन्दा गावश्चिरमुपसृता दूषणकुलैः
खरायन्ते सद्यो रघुतिलक गोवर्धनतटीः ।
विराधत्वं घोषो व्रजति भवदीयप्रवसना-
दिदानीं मारीचः स्फुटमिह नरीणर्ति परितः ॥
खरायन्ते सद्यो रघुतिलक गोवर्धनतटीः ।
विराधत्वं घोषो व्रजति भवदीयप्रवसना-
दिदानीं मारीचः स्फुटमिह नरीणर्ति परितः ॥
अन्वयः
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रघु-तिलक! गावः निरानन्दाः चिरम् दूषण-कुलैः उपसृताः, सद्यः गोवर्धन-तटीः खरा-यन्ते । भवदीय-प्रवसनात् घोषः विराध-त्वम् व्रजति, इदानीम् इह मारीचः परितः स्फुटम् नरीणर्ति ॥
Summary
AI
'O ornament of the *Raghus*, the joyless cows are beset by faults (Dūṣaṇa) and make the slopes of *Govardhana* harsh (Khara). Due to your absence, the settlement faces distress (Virādha), and the heat (Mārīca) clearly dances all around.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | रा | न | न्दा | गा | व | श्चि | र | मु | प | सृ | ता | दू | ष | ण | कु | लैः |
| ख | रा | य | न्ते | स | द्यो | र | घु | ति | ल | क | गो | व | र्ध | न | त | टीः |
| वि | रा | ध | त्वं | घो | षो | व्र | ज | ति | भ | व | दी | य | प्र | व | स | ना |
| दि | दा | नीं | मा | री | चः | स्फु | ट | मि | ह | न | री | ण | र्ति | प | रि | तः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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