इयं नाथ क्रूरा भृगुपतनमकङ्क्षति ततो
यदस्यां कठिनां तव समुचितं तद्भृगुपते ।
असौ ते दुर्बोधा कृतिरिह भवद्विस्मृतिपथं
यतो जातः साक्षाद्गुरुरपि स नन्दीश्वरपतिः ॥
इयं नाथ क्रूरा भृगुपतनमकङ्क्षति ततो
यदस्यां कठिनां तव समुचितं तद्भृगुपते ।
असौ ते दुर्बोधा कृतिरिह भवद्विस्मृतिपथं
यतो जातः साक्षाद्गुरुरपि स नन्दीश्वरपतिः ॥
यदस्यां कठिनां तव समुचितं तद्भृगुपते ।
असौ ते दुर्बोधा कृतिरिह भवद्विस्मृतिपथं
यतो जातः साक्षाद्गुरुरपि स नन्दीश्वरपतिः ॥
अन्वयः
AI
नाथ! इयम् क्रूरा भृगु-पतनम् आकाङ्क्षति, ततः अस्याम् तव यत् कठिनम्, तत् भृगु-पते! समुचितम् । असौ ते कृतिः इह दुर्बोधा, यतः सः साक्षात् गुरुः अपि नन्दीश्वर-पतिः भवत्-विस्मृति-पथम् जातः ॥
Summary
AI
'O Lord, this cruel girl desires a fall from a cliff, so your harshness is fitting for the Lord of the *Bhṛgus*. Your actions are incomprehensible, for even your master, the Lord of *Nandīśvara*, has been forgotten by you.'
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | यं | ना | थ | क्रू | रा | भृ | गु | प | त | न | म | क | ङ्क्ष | ति | त | तो |
| य | द | स्यां | क | ठि | नां | त | व | स | मु | चि | तं | त | द्भृ | गु | प | ते |
| अ | सौ | ते | दु | र्बो | धा | कृ | ति | रि | ह | भ | व | द्वि | स्मृ | ति | प | थं |
| य | तो | जा | तः | सा | क्षा | द्गु | रु | र | पि | स | न | न्दी | श्व | र | प | तिः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.