यदात्मानं दर्पादगणितगुरुर्वामन मुदा
मनोराज्येनाढ्यं त्वयि वलितया कल्पितवती ।
प्रपेदे तस्येदं फलमुचितमेव प्रियसखी
विदूरे यत् क्षिप्ता प्रणयमयपाशे निगडिता ॥
यदात्मानं दर्पादगणितगुरुर्वामन मुदा
मनोराज्येनाढ्यं त्वयि वलितया कल्पितवती ।
प्रपेदे तस्येदं फलमुचितमेव प्रियसखी
विदूरे यत् क्षिप्ता प्रणयमयपाशे निगडिता ॥
मनोराज्येनाढ्यं त्वयि वलितया कल्पितवती ।
प्रपेदे तस्येदं फलमुचितमेव प्रियसखी
विदूरे यत् क्षिप्ता प्रणयमयपाशे निगडिता ॥
अन्वयः
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वामन! यत् आत्मानम् दर्पात् अगणित-गुरुः मुदा मनो-राज्येन आढ्यम् त्वयि वलितया कल्पितवती, प्रिय-सखी तस्य इदम् उचितम् फलम् प्रपेदे, यत् विदूरे क्षिप्ता प्रणय-मय-पाशे निगडिता ॥
Summary
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'O *Vāmana*, because my dear friend, disregarding her elders out of pride, joyfully imagined herself rich in her mind's kingdom through devotion to you, she has received this fitting result: she is cast away and bound in the chains of love.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | त्मा | नं | द | र्पा | द | ग | णि | त | गु | रु | र्वा | म | न | मु | दा |
| म | नो | रा | ज्ये | ना | ढ्यं | त्व | यि | व | लि | त | या | क | ल्पि | त | व | ती |
| प्र | पे | दे | त | स्ये | दं | फ | ल | मु | चि | त | मे | व | प्रि | य | स | खी |
| वि | दू | रे | य | त्क्षि | प्ता | प्र | ण | य | म | य | पा | शे | नि | ग | डि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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