चिरादन्तर्भूता नरहरिमयी मूर्तिरभित-
स्तदीयो व्यापारस्तव तु न ययौ विस्मृतिपथम् ।
विनीतप्रह्लादस्त्वमिह परमक्रूरचरिते
प्रसक्तो यद्भूयः परहृदयभेदं जनयसि ॥
चिरादन्तर्भूता नरहरिमयी मूर्तिरभित-
स्तदीयो व्यापारस्तव तु न ययौ विस्मृतिपथम् ।
विनीतप्रह्लादस्त्वमिह परमक्रूरचरिते
प्रसक्तो यद्भूयः परहृदयभेदं जनयसि ॥
स्तदीयो व्यापारस्तव तु न ययौ विस्मृतिपथम् ।
विनीतप्रह्लादस्त्वमिह परमक्रूरचरिते
प्रसक्तो यद्भूयः परहृदयभेदं जनयसि ॥
अन्वयः
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नर-हरि-मयी मूर्तिः चिरात् अन्तर्भूता, तदीयः व्यापारः तु तव अभितः विस्मृति-पथम् न ययौ । विनीत-प्रह्लादः त्वम् इह परम-क्रूर-चरिते प्रसक्तः यत् भूयः पर-हृदय-भेदम् जनयसि ॥
Summary
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'The man-lion form has long since vanished, yet its conduct has not escaped your memory. Though once kind to *Prahlāda*, you are now engaged in cruel behavior, repeatedly causing the splitting of another's heart.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चि | रा | द | न्त | र्भू | ता | न | र | ह | रि | म | यी | मू | र्ति | र | भि | त |
| स्त | दी | यो | व्या | पा | र | स्त | व | तु | न | य | यौ | वि | स्मृ | ति | प | थम् |
| वि | नी | त | प्र | ह्ला | द | स्त्व | मि | ह | प | र | म | क्रू | र | च | रि | ते |
| प्र | स | क्तो | य | द्भू | यः | प | र | हृ | द | य | भे | दं | ज | न | य | सि |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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