सदा कंसारते स्फुरति चिरमद्यापि भवतः
स्फुटं क्रोडाकारे वपुषि निविडप्रेमलहरी ।
यतः सा सैरन्ध्री मलयरुहपङ्कप्रणयिनी
त्वया क्रोडीचक्रे परमरभसादात्मदयिता ॥
सदा कंसारते स्फुरति चिरमद्यापि भवतः
स्फुटं क्रोडाकारे वपुषि निविडप्रेमलहरी ।
यतः सा सैरन्ध्री मलयरुहपङ्कप्रणयिनी
त्वया क्रोडीचक्रे परमरभसादात्मदयिता ॥
स्फुटं क्रोडाकारे वपुषि निविडप्रेमलहरी ।
यतः सा सैरन्ध्री मलयरुहपङ्कप्रणयिनी
त्वया क्रोडीचक्रे परमरभसादात्मदयिता ॥
अन्वयः
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कंस-अराते! भवतः स्फुटम् क्रोड-आकारे वपुषि निविड-प्रेम-लहरी अद्य अपि चिरम् सदा स्फुरति । यतः सा मल-य-रुह-पङ्क-प्रणयिनी सैरन्ध्री आत्म-दयिता त्वया परम-रभसात् क्रोडी-चक्रे ॥
Summary
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'O enemy of *Kaṃsa*, the wave of intense love clearly shines forever in your boar-shaped body. For you passionately embraced that *Sairandhrī*, fond of sandalwood paste, treating her as your own beloved.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | दा | कं | सा | र | ते | स्फु | र | ति | चि | र | म | द्या | पि | भ | व | तः |
| स्फु | टं | क्रो | डा | का | रे | व | पु | षि | नि | वि | ड | प्रे | म | ल | ह | री |
| य | तः | सा | सै | र | न्ध्री | म | ल | य | रु | ह | प | ङ्क | प्र | ण | यि | नी |
| त्व | या | क्रो | डी | च | क्रे | प | र | म | र | भ | सा | दा | त्म | द | यि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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