ग्रहीतुं त्वां प्रेमामिषपरिवृतं चित्तवडिशं
महामीन क्षिप्रं नाधित रसपूरे मम सखी ।
विवेकाख्यं छित्त्वा गुणमथ तदग्रासि भवता
हताशेयं किं वा शिव शिव विधातुं प्रभवति ॥
ग्रहीतुं त्वां प्रेमामिषपरिवृतं चित्तवडिशं
महामीन क्षिप्रं नाधित रसपूरे मम सखी ।
विवेकाख्यं छित्त्वा गुणमथ तदग्रासि भवता
हताशेयं किं वा शिव शिव विधातुं प्रभवति ॥
महामीन क्षिप्रं नाधित रसपूरे मम सखी ।
विवेकाख्यं छित्त्वा गुणमथ तदग्रासि भवता
हताशेयं किं वा शिव शिव विधातुं प्रभवति ॥
अन्वयः
AI
महा-मीन! प्रेमा-आमिष-परिवृतम् चित्त-वडिशम् ग्रहीतुम् मम सखी रस-पूरे क्षिप्रम् न अधित । अथ भवता विवेक-आख्यम् गुणम् छित्त्वा तत् अग्रासि । हताशा इयम् किम् वा विधातुम् प्रभवति? शिव शिव ॥
Summary
AI
'O Great Fish, my friend did not cast the hook of her heart, baited with the meat of love, into the flood of sentiment just to catch you. But you snapped the thread of her discernment and swallowed the bait. What can this hopeless woman do now? Alas!'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्र | ही | तुं | त्वां | प्रे | मा | मि | ष | प | रि | वृ | तं | चि | त्त | व | डि | शं |
| म | हा | मी | न | क्षि | प्रं | ना | धि | त | र | स | पू | रे | म | म | स | खी |
| वि | वे | का | ख्यं | छि | त्त्वा | गु | ण | म | थ | त | द | ग्रा | सि | भ | व | ता |
| ह | ता | शे | यं | किं | वा | शि | व | शि | व | वि | धा | तुं | प्र | भ | व | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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