इति प्रेमोद्गारप्रवणमनुनीय क्रमवशां
परीवारान् भ्रातर्निशमयति चाणूरमथने ।
पुनः कोपोद्भिन्नप्रणयचटुलं तस्य निकटे
कथामाचक्षीथाः दशभिरवतारैर्विलसिताम् ॥
इति प्रेमोद्गारप्रवणमनुनीय क्रमवशां
परीवारान् भ्रातर्निशमयति चाणूरमथने ।
पुनः कोपोद्भिन्नप्रणयचटुलं तस्य निकटे
कथामाचक्षीथाः दशभिरवतारैर्विलसिताम् ॥
परीवारान् भ्रातर्निशमयति चाणूरमथने ।
पुनः कोपोद्भिन्नप्रणयचटुलं तस्य निकटे
कथामाचक्षीथाः दशभिरवतारैर्विलसिताम् ॥
अन्वयः
AI
भ्रातः! इति प्रेम-उद्गार-प्रवणम् क्रम-वशात् परीवारान् अनुनीय चाणूर-मथने निशमयति (सति), पुनः तस्य निकटे कोप-उद्भिन्न-प्रणय-चटुलम् दशभिः अवतारैः विलसिताम् कथाम् आचक्षीथाः ॥
Summary
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'O brother, having thus addressed the attendants with words of love, while the slayer of *Cāṇūra* listens, you should speak words charming with love broken by anger, recounting the stories of his ten incarnations.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | प्रे | मो | द्गा | र | प्र | व | ण | म | नु | नी | य | क्र | म | व | शां |
| प | री | वा | रा | न्भ्रा | त | र्नि | श | म | य | ति | चा | णू | र | म | थ | ने |
| पु | नः | को | पो | द्भि | न्न | प्र | ण | य | च | टु | लं | त | स्य | नि | क | टे |
| क | था | मा | च | क्षी | थाः | द | श | भि | र | व | ता | रै | र्वि | ल | सि | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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