गृहीत्वा गोविन्दं जलधिहृदयानन्दन सखे
सुखेन श्रीवृन्दावनपरिसरे नन्दतु भवान् ।
कथं वा ते गोष्ठं भवतु दयितं हन्त बलवान्
यदेतस्मिन् वेणोर्जयति चिरसौभाग्यमहिमा ॥
गृहीत्वा गोविन्दं जलधिहृदयानन्दन सखे
सुखेन श्रीवृन्दावनपरिसरे नन्दतु भवान् ।
कथं वा ते गोष्ठं भवतु दयितं हन्त बलवान्
यदेतस्मिन् वेणोर्जयति चिरसौभाग्यमहिमा ॥
सुखेन श्रीवृन्दावनपरिसरे नन्दतु भवान् ।
कथं वा ते गोष्ठं भवतु दयितं हन्त बलवान्
यदेतस्मिन् वेणोर्जयति चिरसौभाग्यमहिमा ॥
अन्वयः
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जलधि-हृदय-आनन्दन सखे! गोविन्दम् गृहीत्वा श्री-वृन्दावन-परिसरे भवान् सुखेन नन्दतु । ते गोष्ठम् दयितम् कथम् वा भवतु? हन्त यत् एतस्मिन् वेणोः चिर-सौभाग्य-महिमा जयति ॥
Summary
AI
'O friend, delight of the ocean's heart, may you dwell happily in the vicinity of *Vṛndāvana* with *Govinda*. But how could the cowherd village be dear to you, when the eternal glory of the flute's good fortune triumphs there?'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गृ | ही | त्वा | गो | वि | न्दं | ज | ल | धि | हृ | द | या | न | न्द | न | स | खे |
| सु | खे | न | श्री | वृ | न्दा | व | न | प | रि | स | रे | न | न्द | तु | भ | वान् |
| क | थं | वा | ते | गो | ष्ठं | भ | व | तु | द | यि | तं | ह | न्त | ब | ल | वा |
| न्य | दे | त | स्मि | न्वे | णो | र्ज | य | ति | चि | र | सौ | भा | ग्य | म | हि | मा |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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