निवासस्ते देवि श्रवणलतिकायामिति धिया
प्रयत्नात् त्वामेव प्रणयहृदया यामि शरणम् ।
परोक्षं वृष्णीनां निभृतनिभृतं कर्णकुहरे
हरेः काकून्मिश्रां कथय सखि राधाविधुरताम् ॥
निवासस्ते देवि श्रवणलतिकायामिति धिया
प्रयत्नात् त्वामेव प्रणयहृदया यामि शरणम् ।
परोक्षं वृष्णीनां निभृतनिभृतं कर्णकुहरे
हरेः काकून्मिश्रां कथय सखि राधाविधुरताम् ॥
प्रयत्नात् त्वामेव प्रणयहृदया यामि शरणम् ।
परोक्षं वृष्णीनां निभृतनिभृतं कर्णकुहरे
हरेः काकून्मिश्रां कथय सखि राधाविधुरताम् ॥
अन्वयः
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देवि! तव निवासः श्रवण-लतिकायाम् इति धिया प्रणय-हृदया अहम् त्वाम् एव प्रयत्नात् शरणम् यामि । सखि! वृष्णीनाम् परोक्षम् हरेः कर्ण-कुहरे निभृत-निभृतम् काकू-मिश्राम् राधा-विधुरताम् कथय ॥
Summary
AI
'O goddess, knowing your abode is the creeper of his ear, I seek refuge in you with a loving heart. O friend, secretly whisper into *Hari*’s ear, away from the *Vṛṣṇis*, the distress of *Rādhā* mixed with plaintive cries.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | वा | स | स्ते | दे | वि | श्र | व | ण | ल | ति | का | या | मि | ति | धि | या |
| प्र | य | त्ना | त्त्वा | मे | व | प्र | ण | य | हृ | द | या | या | मि | श | र | णम् |
| प | रो | क्षं | वृ | ष्णी | नां | नि | भृ | त | नि | भृ | तं | क | र्ण | कु | ह | रे |
| ह | रेः | का | कू | न्मि | श्रां | क | थ | य | स | खि | रा | धा | वि | धु | र | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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