ततः सम्भाषेथाः श्रुतिमकरमुद्रामिति मुदा
भवत्यां कर्तव्यः किमिति कुशलप्रश्नजडिमा ।
रुचिस्मेरा या त्वं रचयसि सदा चुम्बनकलाम्
अपाङ्गेन स्पृष्टा सखि मुररिपोर्गण्डमुकुरे ॥
ततः सम्भाषेथाः श्रुतिमकरमुद्रामिति मुदा
भवत्यां कर्तव्यः किमिति कुशलप्रश्नजडिमा ।
रुचिस्मेरा या त्वं रचयसि सदा चुम्बनकलाम्
अपाङ्गेन स्पृष्टा सखि मुररिपोर्गण्डमुकुरे ॥
भवत्यां कर्तव्यः किमिति कुशलप्रश्नजडिमा ।
रुचिस्मेरा या त्वं रचयसि सदा चुम्बनकलाम्
अपाङ्गेन स्पृष्टा सखि मुररिपोर्गण्डमुकुरे ॥
अन्वयः
AI
ततः मुदा श्रुति-मकर-मुद्राम् इति सम्भाषेथाः - भवत्यां किम् इति कुशल-प्रश्न-जडिमा कर्तव्यः? रुचि-स्मेरा या त्वं सदा चुम्बन-कलाम् रचयसि, (सा त्वं) सखि मुर-रिपोः गण्ड-मुकुरे अपाङ्गेन स्पृष्टा ॥
Summary
AI
Addressing the ear-ornament, the messenger should say: 'Why should there be any hesitation in asking of your welfare? O friend, smiling with luster, you who always practice the art of kissing are touched by the corner of *Murāri*’s eye on the mirror of his cheek.'
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | स | म्भा | षे | थाः | श्रु | ति | म | क | र | मु | द्रा | मि | ति | मु | दा |
| भ | व | त्यां | क | र्त | व्यः | कि | मि | ति | कु | श | ल | प्र | श्न | ज | डि | मा |
| रु | चि | स्मे | रा | या | त्वं | र | च | य | सि | स | दा | चु | म्ब | न | क | ला |
| म | पा | ङ्गे | न | स्पृ | ष्टा | स | खि | मु | र | रि | पो | र्ग | ण्ड | मु | कु | रे |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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