इदं किं वा हन्त स्मरसि रसिके खण्डनरुषा
परीताङ्गी गोवर्धनगिरिनितम्बे मम सखी ।
भिया सम्भ्रान्ताक्षं यदिह विचकर्ष त्वयि बला-
द्गृहीत्वा विभ्रश्यन् नवशिखिशिखं गोकुलपतिम् ॥
इदं किं वा हन्त स्मरसि रसिके खण्डनरुषा
परीताङ्गी गोवर्धनगिरिनितम्बे मम सखी ।
भिया सम्भ्रान्ताक्षं यदिह विचकर्ष त्वयि बला-
द्गृहीत्वा विभ्रश्यन् नवशिखिशिखं गोकुलपतिम् ॥
परीताङ्गी गोवर्धनगिरिनितम्बे मम सखी ।
भिया सम्भ्रान्ताक्षं यदिह विचकर्ष त्वयि बला-
द्गृहीत्वा विभ्रश्यन् नवशिखिशिखं गोकुलपतिम् ॥
अन्वयः
AI
रसिके! हन्त! इदम् किम् वा स्मरसि? गोवर्धन-गिरि-नितम्बे खण्डन-रुषा परीत-अङ्गी मम सखी भिया सम्भ्रान्त-अक्षम् गृहीत्वा विभ्रश्यत्-नव-शिखि-शिखम् गोकुल-पतिम् त्वयि बलात् यत् इह विचकर्ष।
Summary
AI
O tasteful one! Do you perchance remember this? On the slopes of Govardhana hill, my friend, her body overcome with the anger of a jilted lover, forcibly dragged the Lord of Gokula toward you, as he, with startled eyes of fear, let his new peacock-feather slip away.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | दं | किं | वा | ह | न्त | स्म | र | सि | र | सि | के | ख | ण्ड | न | रु | षा |
| प | री | ता | ङ्गी | गो | व | र्ध | न | गि | रि | नि | त | म्बे | म | म | स | खी |
| भि | या | स | म्भ्रा | न्ता | क्षं | य | दि | ह | वि | च | क | र्ष | त्व | यि | ब | ला |
| द्गृ | ही | त्वा | वि | भ्र | श्य | न्न | व | शि | खि | शि | खं | गो | कु | ल | प | तिम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.