मिलद्भङ्गीं हंसीरमण वनमालां प्रथमतो
मुदा क्षेमं पृच्छन्न् इदमुपहरेथा मम वचः ।
चिरं कंसारातेरुरसि सहवासप्रणयिनीं
किमेनामेनाक्षीं गुणवति विसस्मार भवती ॥
मिलद्भङ्गीं हंसीरमण वनमालां प्रथमतो
मुदा क्षेमं पृच्छन्न् इदमुपहरेथा मम वचः ।
चिरं कंसारातेरुरसि सहवासप्रणयिनीं
किमेनामेनाक्षीं गुणवति विसस्मार भवती ॥
मुदा क्षेमं पृच्छन्न् इदमुपहरेथा मम वचः ।
चिरं कंसारातेरुरसि सहवासप्रणयिनीं
किमेनामेनाक्षीं गुणवति विसस्मार भवती ॥
अन्वयः
AI
हंसी-रमण! प्रथमतः मिलत्-भङ्गीम् वन-मालाम् मुदा क्षेमम् पृच्छन् मम इदम् वचः उपहरेथाः। हे गुणवति! चिरम् कंस-अरातेः उरसि सहवास-प्रणयिनीम् एनाम् एन-अक्षीम् किम् भवती विसस्मार?
Summary
AI
O lover of the female swan! First, joyfully asking the welfare of the forest garland which meets him with wavy lines, convey these words of mine: "O virtuous one! Have you forgotten this fawn-eyed woman who for so long was your companion in dwelling upon the chest of Kṛṣṇa?"
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मि | ल | द्भ | ङ्गीं | हं | सी | र | म | ण | व | न | मा | लां | प्र | थ | म | तो |
| मु | दा | क्षे | मं | पृ | च्छ | न्नि | द | मु | प | ह | रे | था | म | म | व | चः |
| चि | रं | कं | सा | रा | ते | रु | र | सि | स | ह | वा | स | प्र | ण | यि | नीं |
| कि | मे | ना | मे | ना | क्षीं | गु | ण | व | ति | वि | स | स्मा | र | भ | व | ती |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.