इति श्रीकंसारेः पदकमलयोर्गोकुलकथां
निवेद्य प्रत्येकं भज परिजनेषु प्रणयिताम् ।
निजाङ्के कादम्बीसहचर वहन् मण्डनतया
न यान् उच्चैः प्रेमप्रवणमनुजग्राह भगवान् ॥
इति श्रीकंसारेः पदकमलयोर्गोकुलकथां
निवेद्य प्रत्येकं भज परिजनेषु प्रणयिताम् ।
निजाङ्के कादम्बीसहचर वहन् मण्डनतया
न यान् उच्चैः प्रेमप्रवणमनुजग्राह भगवान् ॥
निवेद्य प्रत्येकं भज परिजनेषु प्रणयिताम् ।
निजाङ्के कादम्बीसहचर वहन् मण्डनतया
न यान् उच्चैः प्रेमप्रवणमनुजग्राह भगवान् ॥
अन्वयः
AI
इति श्री-कंस-अरेः पद-कमलयोः गोकुल-कथाम् निवेद्य परिजनेषु प्रत्येकम् प्रणयिताम् भज। कादम्बी-सहचर! निज-अङ्के मण्डनतया वहन् प्रेम-प्रवणम् तान् उच्चैः न अनुजग्राह भगवान्।
Summary
AI
Thus, having offered the story of Gokula at the lotus-feet of Kaṃsāri (Kṛṣṇa), show affection to each of his attendants. O companion of the swan! The Lord did not exceptionally favor those whom he already held as ornaments upon his own lap, being inclined toward love.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | श्री | कं | सा | रेः | प | द | क | म | ल | यो | र्गो | कु | ल | क | थां |
| नि | वे | द्य | प्र | त्ये | कं | भ | ज | प | रि | ज | ने | षु | प्र | ण | यि | ताम् |
| नि | जा | ङ्के | का | द | म्बी | स | ह | च | र | व | ह | न्म | ण्ड | न | त | या |
| न | या | नु | च्चैः | प्रे | म | प्र | व | ण | म | नु | ज | ग्रा | ह | भ | ग | वान् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.