विदूरादाहर्तुं कुसुममुपयामि त्वमधुना
पुरस्तीरे तीरे कलय तुलसीपल्लवमिदम् ।
इति व्याजादेनां विदितभवदीयस्थितिरहं
कदा कुञ्जे गोपीरमण गमयिष्यामि समये ॥
विदूरादाहर्तुं कुसुममुपयामि त्वमधुना
पुरस्तीरे तीरे कलय तुलसीपल्लवमिदम् ।
इति व्याजादेनां विदितभवदीयस्थितिरहं
कदा कुञ्जे गोपीरमण गमयिष्यामि समये ॥
पुरस्तीरे तीरे कलय तुलसीपल्लवमिदम् ।
इति व्याजादेनां विदितभवदीयस्थितिरहं
कदा कुञ्जे गोपीरमण गमयिष्यामि समये ॥
अन्वयः
AI
गोपी-रमण! कुसुमम् आहर्तुम् विदूरत् उपयामि, त्वम् अधुना पुरः तीरे तीरे इदम् तुलसी-पल्लवम् कलय। इति व्याजात् विदित-भवदीय-स्थितिः अहम् एनाम् कदा कुञ्जे समये गमयिष्यामि।
Summary
AI
O lover of the Gopīs, when shall I, knowing your presence, lead her to the bower at the right time under the pretext of saying: "I am going far to gather flowers; you, meanwhile, collect these Tulasī leaves along the nearby bank"?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | दू | रा | दा | ह | र्तुं | कु | सु | म | मु | प | या | मि | त्व | म | धु | ना |
| पु | र | स्ती | रे | ती | रे | क | ल | य | तु | ल | सी | प | ल्ल | व | मि | दम् |
| इ | ति | व्या | जा | दे | नां | वि | दि | त | भ | व | दी | य | स्थि | ति | र | हं |
| क | दा | कु | ञ्जे | गो | पी | र | म | ण | ग | म | यि | ष्या | मि | स | म | ये |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.