धृतानन्दांवृन्दावनपरिसरे शारदनिशा-
विलासोल्लासेन ग्लपितकवरीफुल्लकुसुमाम् ।
तव स्कन्धोपान्ते विनिहितभुजावल्लरिमहं
कदा कुञ्जे लीना रहसि विहसिष्यामि सुमुखीम् ॥
धृतानन्दांवृन्दावनपरिसरे शारदनिशा-
विलासोल्लासेन ग्लपितकवरीफुल्लकुसुमाम् ।
तव स्कन्धोपान्ते विनिहितभुजावल्लरिमहं
कदा कुञ्जे लीना रहसि विहसिष्यामि सुमुखीम् ॥
विलासोल्लासेन ग्लपितकवरीफुल्लकुसुमाम् ।
तव स्कन्धोपान्ते विनिहितभुजावल्लरिमहं
कदा कुञ्जे लीना रहसि विहसिष्यामि सुमुखीम् ॥
अन्वयः
AI
वृन्दावन-परिसरे शरद्-निशा-विलास-उल्लासेन धृत-आनन्दाम् ग्लपित-कवरी-फुल्ल-कुसुमाम् तव स्कन्ध-उपान्ते विनिहित-भुजा-वल्लरिम् कुञ्जे लीना अहम् कदा रहसि सुमुखीम् विहसिष्यामि।
Summary
AI
When shall I, hiding in a secret bower, laugh at that beautiful-faced one, who is filled with joy by the splendor of an autumn night in the outskirts of Vṛndāvana, her braided hair's flowers withered, and her vine-like arms resting upon your shoulders?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धृ | ता | न | न्दां | वृ | न्दा | व | न | प | रि | स | रे | शा | र | द | नि | शा |
| वि | ला | सो | ल्ला | से | न | ग्ल | पि | त | क | व | री | फु | ल्ल | कु | सु | माम् |
| त | व | स्क | न्धो | पा | न्ते | वि | नि | हि | त | भु | जा | व | ल्ल | रि | म | हं |
| क | दा | कु | ञ्जे | ली | ना | र | ह | सि | वि | ह | सि | ष्या | मि | सु | मु | खीम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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