तदुत्तिष्ठ व्रीडावति निविडमुक्तालतिकया
वधानेमं धूर्तं सखि मधुपुरीं याति न यथा ।
इति प्रेमोन्मीलद्भवदनुभवारूढजडिमा
सखीनामाक्रन्दं न किल कतिशः कन्दलयति ॥
तदुत्तिष्ठ व्रीडावति निविडमुक्तालतिकया
वधानेमं धूर्तं सखि मधुपुरीं याति न यथा ।
इति प्रेमोन्मीलद्भवदनुभवारूढजडिमा
सखीनामाक्रन्दं न किल कतिशः कन्दलयति ॥
वधानेमं धूर्तं सखि मधुपुरीं याति न यथा ।
इति प्रेमोन्मीलद्भवदनुभवारूढजडिमा
सखीनामाक्रन्दं न किल कतिशः कन्दलयति ॥
अन्वयः
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तत् व्रीडावति! उत्तिष्ठ। सखि! निविड-मुक्ता-लतिकया इमम् धूर्तम् बधान, यथा मधुपुरीम् न याति। इति प्रेम-उन्मीलत्-भवत्-अनुभव-आरूढ-जडिमा सखीनामाक्रन्दम् कतिशः न कन्दलयति।
Summary
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"Therefore, O bashful one, rise! O friend, bind this rogue with a thick vine of pearls so that he cannot go to Madhupurī." Thus, her stupor born from the experience of your presence awakened by love repeatedly sprouts the lamentations of her friends.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दु | त्ति | ष्ठ | व्री | डा | व | ति | नि | वि | ड | मु | क्ता | ल | ति | क | या |
| व | धा | ने | मं | धू | र्तं | स | खि | म | धु | पु | रीं | या | ति | न | य | था |
| इ | ति | प्रे | मो | न्मी | ल | द्भ | व | द | नु | भ | वा | रू | ढ | ज | डि | मा |
| स | खी | ना | मा | क्र | न्दं | न | कि | ल | क | ति | शः | क | न्द | ल | य | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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